- 1983 में हॉवर्ड गार्डनर ने प्रस्ताव रखा कि मनुष्य में कई अपेक्षाकृत स्वतंत्र बुद्धियाँ होती हैं — जैसे भाषाई, तार्किक-गणितीय, स्थानिक, संगीतमय, शारीरिक-गतिक, अंतर्वैयक्तिक, अंतर्व्यक्तिक और प्राकृतिक।
- यह इस सहज अनुभव से मेल खाता है कि अलग-अलग लोगों की अलग-अलग खूबियाँ होती हैं और स्कूल क्षमता के बहुत सीमित हिस्से को ही ज़्यादा महत्व देते हैं। शिक्षकों ने इसे व्यापक रूप से अपनाया।
- कई मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि इन 'बुद्धियों' को प्रतिभा या योग्यता कहना अधिक उचित है, और ये आपस में सहसंबंधित भी रहती हैं, जिससे पूर्ण स्वतंत्रता का दावा कमज़ोर पड़ता है। इसका अनुभवजन्य समर्थन विवादित है।
- गार्डनर के सिद्धांत ने क्षमता को लेकर आम सोच को विस्तृत किया, फिर भी मुख्यधारा का विज्ञान उनके सभी क्षेत्रों में एक सामान्य कारक पाता है। यह प्रभावशाली है, पर अंतिम रूप से सिद्ध नहीं।
गार्डनर ने क्या प्रस्तावित किया?
1983 में हॉवर्ड गार्डनर ने प्रस्ताव रखा कि मनुष्य में कई अपेक्षाकृत स्वतंत्र बुद्धियाँ होती हैं — जैसे भाषाई, तार्किक-गणितीय, स्थानिक, संगीतमय, शारीरिक-गतिक, अंतर्वैयक्तिक, अंतर्व्यक्तिक और प्राकृतिक।
यह सिद्धांत इतना लोकप्रिय क्यों है?
यह इस सहज अनुभव से मेल खाता है कि अलग-अलग लोगों की अलग-अलग खूबियाँ होती हैं और स्कूल क्षमता के बहुत सीमित हिस्से को ही ज़्यादा महत्व देते हैं। शिक्षकों ने इसे व्यापक रूप से अपनाया।
आलोचक क्या कहते हैं?
कई मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि इन 'बुद्धियों' को प्रतिभा या योग्यता कहना अधिक उचित है, और ये आपस में सहसंबंधित भी रहती हैं, जिससे पूर्ण स्वतंत्रता का दावा कमज़ोर पड़ता है। इसका अनुभवजन्य समर्थन विवादित है।
निष्कर्ष क्या है?
गार्डनर के सिद्धांत ने क्षमता को लेकर आम सोच को विस्तृत किया, फिर भी मुख्यधारा का विज्ञान उनके सभी क्षेत्रों में एक सामान्य कारक पाता है। यह प्रभावशाली है, पर अंतिम रूप से सिद्ध नहीं।